रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) देश में प्लास्टिक (पॉलिमर) के नोट लाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. हाल ही में पटना और मुंबई में हुई केंद्रीय बैंक के बोर्ड की बैठकों में इस मुद्दे पर लंबी चर्चा हुई है. पिछले कुछ वर्षों में नकदी की भारी मांग, कागज के नोटों की छपाई की बढ़ती लागत और उनके जल्दी खराब होने की समस्या को देखते हुए यह कदम उठाया जा रहा है. जल्द ही आम जनता के लिए प्लास्टिक के नोटों का एक पायलट प्रोजेक्ट (Pilot Project) शुरू होने की उम्मीद है, जिसके बाद इसे पूरे देश में लागू किया जा सकता है.
नोटों की छपाई का भारी-भरकम खर्च कम करने की कवायद
भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया वार्षिक रिपोर्ट (FY25) के आंकड़े बताते हैं कि कागज के नोट छापने में केंद्रीय बैंक को 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े. यह पिछले वित्तीय वर्ष के 5,101.4 करोड़ रुपये के मुकाबले काफी ज्यादा है. छपाई का यह खर्च मुख्य रूप से बाजार में नोटों की बढ़ती मांग के कारण बढ़ा है.
मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों का कहना है कि कागज की तुलना में प्लास्टिक के नोट छापना लंबी अवधि (Long Term) में बहुत ज्यादा किफायती साबित होता है. सबसे अच्छी बात यह है कि देश के एटीएम (ATM) भी अब तकनीकी रूप से इतने एडवांस हो चुके हैं कि वे आसानी से इन पॉलिमर नोटों को पहचान कर बिना किसी तकनीकी खराबी के बाहर निकाल सकते हैं.
कटे-फटे और मैले नोटों के झंझट से मिलेगी मुक्ति
अक्सर आम जनता की जेब में आने वाले कागज के नोट मैले, फटे या पानी से खराब हुए होते हैं. इन खराब नोटों (Soiled Notes) को बाजार से वापस लेना और उन्हें सुरक्षित रूप से नष्ट करना आरबीआई के लिए एक बहुत बड़ा और खर्चीला टास्क है.
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खराब नोटों का आंकड़ा: वित्त वर्ष 2025 में 23.8 अरब खराब नोटों को चलन से बाहर किया गया.
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सालाना बढ़ोतरी: यह आंकड़ा पिछले साल के 21.24 अरब नोटों से 12.3 फीसदी ज्यादा है.
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सबसे ज्यादा खराब नोट: चलन से बाहर किए गए नोटों में सबसे ज्यादा संख्या 500 रुपये के नोटों की थी, जिसके बाद 100 रुपये के नोटों का नंबर आता है.
डिजिटल युग में भी नकदी का क्रेज बरकरार
देश में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ने के बावजूद नकदी का क्रेज कम नहीं हुआ है. आंकड़ों के अनुसार, 15 मई तक चलन में मौजूद कुल मुद्रा (Currency in Circulation - CiC) सालाना आधार पर 11.5 फीसदी बढ़कर 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. ऐसे में प्लास्टिक के नोटों की उम्र कागज के नोटों के मुकाबले 4 से 5 गुना ज्यादा होने के कारण, यह सरकार और आरबीआई दोनों के लिए घाटे का सौदा नहीं बल्कि एक बेहतरीन और टिकाऊ विकल्प साबित होगा.