ईरान और अमेरिका के बीच छिड़े संघर्ष में चीन ने सीधे तौर पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन इस कूटनीतिक 'चुप्पी' ने बीजिंग को वे फायदे पहुंचा दिए हैं जो शायद युद्ध लड़कर भी मुमकिन नहीं थे। राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 'वेट एंड वॉच' की नीति अपनाकर न केवल अमेरिका की सैन्य ताकत का आकलन किया, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति को भी अभूतपूर्व मजबूती दी।
1. अमेरिका का सैन्य 'एक्स-रे' और हथियारों की कमी
चीन के लिए यह युद्ध एक 'लाइव प्रयोगशाला' की तरह रहा। अमेरिका द्वारा JASSM-ER, टॉमहॉक और THAAD जैसे घातक सिस्टम के इस्तेमाल ने चीन को अमेरिकी युद्ध कौशल और AI-आधारित हमलों की गहराई समझने का मौका दे दिया।
- सीमित भंडार: युद्ध की वजह से अमेरिका के आधुनिक हथियारों का स्टॉक कम हुआ है, जिसे फिर से भरने में वक्त लगेगा।
- रणनीतिक लाभ: चीन ने सीखा कि कैसे सस्ते ड्रोन महंगे डिफेंस सिस्टम को छका सकते हैं। यह अनुभव वह भविष्य में ताइवान के मोर्चे पर इस्तेमाल कर सकता है।
2. ग्लोबल सप्लाई चेन और ऊर्जा पर कब्जा
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव ने दुनिया को जीवाश्म ईंधन से दूर धकेल दिया है।
- सोलर और बैटरी किंग: चीन सोलर, विंड और ईवी बैटरी की सप्लाई चेन में 70% से अधिक हिस्सेदारी रखता है। जैसे-जैसे दुनिया रिन्यूएबल एनर्जी की ओर भाग रही है, चीन का मुनाफा और दबदबा बढ़ रहा है।
- ऊर्जा सुरक्षा: चीन अपनी 85% ऊर्जा जरूरतें खुद पूरी कर रहा है, जिससे वह वैश्विक तेल संकट से काफी हद तक सुरक्षित रहा।
3. 'शांतिदूत' की कूटनीतिक छवि
जहां एक ओर अमेरिका की छवि एक आक्रामक सैन्य शक्ति की बनी रही, वहीं चीन ने पाकिस्तान के माध्यम से बातचीत की मेज सजाकर खुद को एक स्थिर और भरोसेमंद ताकत के रूप में पेश किया। इससे अमेरिका के कई सहयोगी देशों के मन में यह सवाल उठा कि क्या संकट के समय वाशिंगटन वाकई उनके काम आएगा।
4. AI और भविष्य की तकनीक में बढ़त
मिडिल ईस्ट में पश्चिमी देशों के AI प्रोजेक्ट्स पर युद्ध के कारण ब्रेक लग गया। ऐसे में चीन ने अपनी विशाल कंप्यूटिंग क्षमता के दम पर उन निवेशों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया है। पश्चिमी कंपनियों के पीछे हटने से जो 'टेक्नोलॉजी वैक्यूम' बना है, उसे चीनी कंपनियां तेजी से भर रही हैं।